स्तोत्रादिसंग्रहः
यह संग्रह आषाढ शु।।१, शके १८७४ (इ.स.१९५२) को प्रातःस्मरणीय प. पू. श्रीगुळवणीमहाराजजी ने वासुदेवानंद सरस्वती ग्रंथमाला के द्वितीय पुष्प के रूप में प्रकाशित किया। इस में श्रीस्वामीमहाराज के रचित विविध देवताओं के, तीर्थक्षेत्रों के संस्कृत और प्राकृत स्तोत्रों के साथ श्रीदत्तात्रेयषोडशावतार, सत्यदत्तव्रत, अभंग, पदसमूह, नित्यभजनक्रम, आरतिसंग्रह आदि स्वामीमहाराजजी रा उपलब्ध संकीर्ण वाङ्मय का भी संकलन किया गया है। यह अनेक वर्षों से पुस्तकरूप में उपलब्ध नही है। इस के कोई अंश स्वतंत्र पुस्तकरूप में अवश्य संस्करित हुए हैं और कहीं कहीं उपलब्ध हैं। यहाँ पर इन सब का संग्रह करने का प्रयास किया जा रहा है।
समंत्रक (मंत्रगर्भ) स्तोत्र वह होता है जिस में प्रत्येक श्लोक का विशिष्ट अक्षर (प्रथम, तृतीय, पंचम) क्रम से जोड कर पढने से विविध देवताओं के मंत्र पाये जाते हैं। श्रीमहाराज के अनेक स्तोत्र समंत्रक है। यहाँ ऐसे स्तोत्रों का तारका (*) चिह्न से निर्देश किया है। इन के प्रस्तुति में इन मंत्रों को स्पष्ट करते हुए भी स्तोत्र के अर्थ को समझने में कठिनाई न हो ऐसा प्रयास किया हैं। इस विषय में दर्शकों की सूचनाओं का स्वागत हैं। स्तोत्र भक्तिमार्ग का एक प्रभावी साधन है। परमात्मा को स्तोत्रप्रिय कहा गया है। स्तवन से हि गजेंद्र, पुष्पदंत आदि भक्तों ने अपने इष्ट का प्रसाद पाया है। इसी कारण श्रीमहाराज ने विपुल स्तोत्ररचना के द्वारा यह भक्ति का पथ विशाल और सुगम बनाया है। श्रीमहाराज के स्तोत्र काव्यगुणों से परिपूर्ण होने के साथ ईशप्रसादकारक भी हैं। इन के अनुष्ठान से अनेकानेक भक्त-साधक जनों ने इष्टसिद्धि के साथ चित्तशुद्धि का भी लाभ सरल ही प्राप्त किया है, भविष्य में भी करेंगे। हमारा यह प्रयास यदि कोई साधक-भक्त के यत्किंचिदपि उपयुक्त सिद्ध हुआ तो वह श्रीदत्तप्रभु की कृपा होगी।




